Diabetes Reversal - डायबिटीज को कंट्रोल नहीं, रिवर्स कैसे करें?
- सही भोजन और समझ का विज्ञान - आपने अक्सर सुना होगा कि डायबिटीज ऐसी बीमारी है जिसे पूरी तरह ठीक नहीं किया जा सकता, बस कंट्रोल किया जा सकता है। लेकिन 1999 के बाद अमेरिका में इंसुलिन रेजिस्टेंस पर हुई गहन रिसर्च ने इस सोच को बदल दिया।
- आज दुनिया भर के हजारों वैज्ञानिक मानते हैं कि डायबिटीज को केवल कंट्रोल ही नहीं, बल्कि सही समझ और सही तरीकों से रिवर्स भी किया जा सकता है। यानी बीमारी को दबाने के बजाय उसकी जड़ पर काम करके उसे खत्म किया जा सकता है।
- डायबिटीज को समझने के लिए सबसे पहले हमें यह जानना जरूरी है कि हम जो खाना खाते हैं, वह शरीर में कैसे काम करता है। हमारे भोजन में मुख्य रूप से तीन चीजें होती हैं—प्रोटीन, फैट और कार्बोहाइड्रेट।
- इनमें से कार्बोहाइड्रेट शरीर में जाकर शुगर में बदलते हैं। यह शुगर खून में पहुंच जाती है, लेकिन अपने आप कोशिकाओं के अंदर नहीं जा सकती। इसके लिए इंसुलिन की जरूरत होती है। इंसुलिन खून से शुगर को उठाकर कोशिकाओं तक पहुंचाता है, ताकि शरीर उसे ऊर्जा के रूप में इस्तेमाल कर सके।
- समस्या तब शुरू होती है जब हम लगातार ज्यादा कार्बोहाइड्रेट वाला भोजन करते हैं। इससे खून में शुगर बढ़ती है और उसे कंट्रोल करने के लिए शरीर ज्यादा इंसुलिन बनाने लगता है। लेकिन कोशिकाओं की भी एक सीमा होती है।
- जब बार-बार ज्यादा शुगर जबरदस्ती अंदर डाली जाती है, तो कोशिकाएं इंसुलिन की बात सुनना बंद कर देती हैं। इसे ही इंसुलिन रेजिस्टेंस कहा जाता है। इस स्थिति में इंसुलिन मौजूद होने के बावजूद शुगर कोशिकाओं के अंदर नहीं जा पाती और खून में जमा होने लगती है।
- यहीं से डायबिटीज की शुरुआत होती है। जांच में ब्लड शुगर बढ़ा हुआ आता है और इलाज की शुरुआत दवाइयों से होती है। ये दवाइयां शरीर को और ज्यादा इंसुलिन बनाने के लिए मजबूर करती हैं, जिससे कुछ समय के लिए ब्लड शुगर नॉर्मल दिखने लगता है। लेकिन असल समस्या वहीं की वहीं रहती है।
- इस तरीके का साइड इफेक्ट यह होता है कि शरीर में फैट जमा होने लगता है, वजन बढ़ता है और धीरे-धीरे दूसरी बीमारियां भी जुड़ जाती हैं—जैसे हाई ब्लड प्रेशर, हाई कोलेस्ट्रॉल, फैटी लिवर और हार्ट से जुड़ी समस्याएं। यानी एक बीमारी को संभालने के चक्कर में कई नई परेशानियां खड़ी हो जाती हैं।
- अब अगर हम समझदारी से सोचें, तो सवाल उठता है—अगर समस्या की जड़ ज्यादा ब्लड शुगर है, और ब्लड शुगर बढ़ने की वजह ज्यादा कार्बोहाइड्रेट है, तो समाधान क्या होना चाहिए? जवाब साफ है—कार्बोहाइड्रेट का सेवन कम करना।
- जब खाने में कार्बोहाइड्रेट कम होते हैं, तो ब्लड शुगर अपने आप कम होने लगती है। ब्लड शुगर कम होगी तो इंसुलिन की जरूरत भी घटेगी। जैसे-जैसे इंसुलिन का स्तर कम होता है, वैसे-वैसे इंसुलिन रेजिस्टेंस भी कम होने लगती है। और जब इंसुलिन रेजिस्टेंस रिवर्स होती है, तो डायबिटीज भी रिवर्स होने लगती है। इसके साथ वजन घटता है, ब्लड प्रेशर सुधरता है, कोलेस्ट्रॉल कंट्रोल में आता है और हार्ट डिज़ीज़ का खतरा भी कम हो जाता है।
- इस पूरे रास्ते में दो चीजें सबसे जरूरी हैं—ज्ञान और अनुशासन।
- ज्ञान यानी यह समझना कि कौन सा खाना ब्लड शुगर बढ़ाता है और कौन सा नहीं।
- और अनुशासन यानी यह जानने के बाद भी गलत खाने से खुद को रोक पाना।
- यह समझना भी जरूरी है कि सभी कार्बोहाइड्रेट एक जैसे नहीं होते। कुछ कार्बोहाइड्रेट ब्लड शुगर को बहुत तेजी से बढ़ाते हैं, जबकि कुछ का असर बहुत कम होता है। इसलिए डायबिटीज में कार्बोहाइड्रेट को गहराई से समझना जरूरी है।
- कार्बोहाइड्रेट का बेसिक यूनिट शुगर मॉलिक्यूल होता है। इसी आधार पर इन्हें चार भागों में बांटा जाता है।
- मोनोसैकराइड सबसे सरल शुगर होते हैं, जिनमें ग्लूकोज़ ब्लड शुगर सबसे तेजी से बढ़ाता है।
- डाइसेकराइड पाचन के दौरान टूटकर शुगर बन जाते हैं और ब्लड शुगर बढ़ाते हैं।
- ओलिगोसैकराइड और फाइबर जैसे कार्बोहाइड्रेट या तो बहुत कम असर डालते हैं या बिल्कुल नहीं डालते।
- वहीं स्टार्च जैसे पॉलीसेकराइड आसानी से पच जाते हैं और ब्लड शुगर तेजी से बढ़ाते हैं।
- यहीं से ग्लाइसेमिक और नॉन-ग्लाइसेमिक कार्बोहाइड्रेट का कॉन्सेप्ट आता है। जो कार्बोहाइड्रेट ब्लड शुगर बढ़ाते हैं, वे ग्लाइसेमिक हैं, और जो नहीं बढ़ाते, वे नॉन-ग्लाइसेमिक। फाइबर इसका सबसे अच्छा उदाहरण है।
- किसी भी भोजन का असर समझने के लिए नेट कार्बोहाइड्रेट देखा जाता है:
- नेट कार्ब = टोटल कार्बोहाइड्रेट – फाइबर
- जिस भोजन में नेट कार्ब कम होगा, वह डायबिटीज के लिए उतना ही सुरक्षित होगा।
- घी, तेल, फैट और प्रोटीन ब्लड शुगर नहीं बढ़ाते। ज्यादातर सब्जियां सुरक्षित होती हैं। नट्स, सीड्स और सीमित फल भी लिए जा सकते हैं। सबसे ज्यादा सावधानी अनाज, दालें और मीठे पदार्थों में रखनी चाहिए, क्योंकि इनमें कार्बोहाइड्रेट बहुत ज्यादा होता है।
- इन्हीं सिद्धांतों के आधार पर डायबिटीज रिवर्सल के लिए एक लचीला डाइट प्लान बनाया जा सकता है, जो आपकी लाइफस्टाइल के साथ लंबे समय तक चल सके।
- डायबिटीज रिवर्सल डाइट के पाँच बेसिक नियम हैं—
- दिन का कुल ग्लाइसेमिक लोड 25 से नीचे रखें।
- 12 घंटे की ईटिंग विंडो और 12 घंटे की फास्टिंग रखें।
- दिन में कम से कम एक मील कच्चा भोजन शामिल करें।
- अगर नॉन-वेज खाते हैं तो सब्जियों की मात्रा दोगुनी रखें।
- और रोज कम से कम 3 लीटर पानी पिएं।
- अंत में यही कहा जा सकता है कि डायबिटीज रिवर्सल किसी चमत्कार से नहीं, बल्कि सही जानकारी और लगातार अनुशासन से संभव है। जब आप अपने भोजन को समझकर चुनते हैं और उसे नियमित रूप से फॉलो करते हैं, तो ब्लड शुगर के साथ-साथ वजन और ओवरऑल हेल्थ में भी साफ सुधार दिखाई देता है।

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