Ayurvedic Diet for Diabetes - डायबिटीज़ में सही खान-पान क्यों सबसे ज़रूरी है?
इस पोस्ट में हम बात करेंगे कि डायबिटीज़ के मरीज़ों को अपना खान-पान कैसा रखना चाहिए और उनके लिए सबसे बेहतर डाइट प्लान क्या हो सकता है।
लेकिन यह बात यहीं तक सीमित नहीं है। सच यह है कि जो डाइट प्लान हम जानेगें, वह सिर्फ डायबिटीज़ वालों के लिए नहीं, बल्कि हर उस व्यक्ति के लिए फायदेमंद है जो भविष्य में कभी भी डायबिटीज़ नहीं चाहता।
यह डाइट उन लोगों के लिए भी उतनी ही ज़रूरी है जिनकी शुगर बॉर्डरलाइन रहती है, जिन्हें एसिडिटी की दवाइयाँ चल रही हैं या जिनमें डायबिटीज़ से जुड़ी जटिलताएँ जैसे डायबिटिक न्यूरोपैथी या रेटिनोपैथी शुरू हो चुकी हैं। कुल मिलाकर, अगर शरीर में किसी भी तरह की मेटाबॉलिक गड़बड़ी है, तो यह डाइट प्लान सबसे सुरक्षित और संतुलित विकल्प है।
इस पोस्ट में हम आसान टिप्स जानेगें। ये कोई सख्त नियम नहीं हैं, बल्कि रोज़मर्रा की ज़िंदगी में आसानी से अपनाई जा सकने वाली बातें हैं।
1.आयुर्वेद की भोजन विधि: सिर्फ क्या नहीं, कैसे भी ज़रूरी है
आयुर्वेद में केवल यह नहीं बताया गया कि क्या खाना चाहिए, बल्कि यह भी बताया गया है कि खाना कैसे बनाना है और कैसे खाना है। भोजन बनाते समय मन शांत और प्रसन्न होना चाहिए। खाना घर का बना, सात्विक, ताज़ा और पचने में हल्का होना चाहिए।
खाना तभी खाना चाहिए जब सही मायने में भूख लगी हो। खाते समय टीवी, मोबाइल या बातचीत से दूरी बनाकर, शांत मन से, हर निवाले को अच्छे से चबाकर खाना चाहिए। यह पूरी प्रक्रिया शरीर और मन दोनों पर गहरा असर डालती है।
2. निदान परिवर्जन: बीमारी की जड़ पर काम करना
डायबिटीज़ के इलाज में आयुर्वेद का दूसरा बड़ा सिद्धांत है निदान परिवर्जन, यानी जिन कारणों से बीमारी हुई है, उन्हें हटाना। आचार्य चरक ने प्रमेह के कई कारण बताए हैं, जिनमें मधुमेह भी शामिल है।
अगर खान-पान की बात करें, तो बार-बार दही खाना, खासकर रात में दही लेना, बहुत ज़्यादा तरल आहार लेना, बार-बार पानी पीते रहना, अत्यधिक नॉनवेज खाना, नया चावल या नया अनाज ज़्यादा खाना, रोज़ाना मीठा या गुड़ से बने पदार्थों का अधिक सेवन करना – ये सभी कफ और मेद को बढ़ाने वाले कारण हैं, जो डायबिटीज़ को जन्म देते हैं।
आचार्य सुश्रुत ने भी ठंडी चीज़ों का अत्यधिक सेवन, बार-बार बासी भोजन, बहुत तला-भुना और ज़्यादा चिकनाई वाला खाना डायबिटीज़ को बढ़ाने वाला बताया है। इसलिए इन आदतों से दूरी बनाना बेहद ज़रूरी है।
3. सिर्फ कड़वा खाना सही नहीं: रसों का संतुलन समझिए
अक्सर जैसे ही किसी का शुगर लेवल बढ़ता है, उसे हर कोई सलाह देने लगता है कि अब कड़वा ज़्यादा खाओ, मीठा पूरी तरह बंद कर दो। लेकिन आयुर्वेद इस सोच से थोड़ा अलग है।
आयुर्वेद के अनुसार हमारा आहार षड्-रसात्मक होना चाहिए, यानी उसमें छह स्वाद होने चाहिए –
मधुर (मीठा), अम्ल (खट्टा), लवण (नमकीन), कटु (तीखा), तिक्त (कड़वा) और कषाय (कसैला)।
मतलब यह नहीं कि मीठा पूरी तरह बंद कर दिया जाए, बल्कि यह ज़रूरी है कि किसी भी एक रस का अत्यधिक सेवन न हो।
a. मधुर रस: सही मात्रा में ज़रूरी क्यों है?
मधुर रस यानी मीठा स्वाद आयुर्वेद के अनुसार जन्म से ही शरीर के अनुकूल होता है। माँ का दूध इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। यह सप्त धातुओं – रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा और शुक्र – को पोषण देता है।
मीठा रस त्वचा, बालों, इंद्रियों और ओज को बढ़ाता है और दीर्घायु में सहायक होता है। लेकिन जब यही मधुर रस ज़रूरत से ज़्यादा लिया जाए, तो कफ और चर्बी बढ़ाकर डायबिटीज़ की समस्या पैदा करता है।
b. डायबिटीज़ में सुरक्षित मधुर विकल्प क्या हैं?
आयुर्वेद ने ऐसे कई मधुर विकल्प बताए हैं जो संतुलन बनाए रखते हैं। जैसे देसी गाय का घी, जिसे दिन में 2 से 3 छोटे चम्मच तक लिया जा सकता है। यह मीठे स्वाद का होता है और शरीर के लिए पोषक है।
स्वर्णसिद्ध जल यानी सोने के टुकड़े के साथ उबला पानी भी बताया गया है। इसके अलावा शुद्ध शहद, जो कफ को कम करता है, सीमित मात्रा में लिया जा सकता है।
मौसमी फल, शतावरी, बला, अतिबला, विदारीकंद जैसी औषधियाँ भी मधुर रस में आती हैं और सही मात्रा में फायदेमंद हैं। वहीं आर्टिफिशियल स्वीटनर और शुगर-फ्री टैबलेट से बचना बेहतर है।
c. तिक्त रस: कड़वे स्वाद का सही इस्तेमाल
तिक्त रस यानी कड़वा स्वाद शरीर की सफाई में मदद करता है। यह बुखार, जलन, कीड़े, कफ और अतिरिक्त चर्बी को कम करता है, इसलिए डायबिटीज़ में उपयोगी माना जाता है।
करेले की सब्ज़ी, आम के पत्ते, मेथी-सौंफ की सब्ज़ी, मूंग दाल के साथ बनी हल्की सब्ज़ियाँ, धनिया-जीरा जैसे मसाले इस श्रेणी में आते हैं। ध्यान बस इतना रखना है कि जिन लोगों को एसिडिटी या सीने में जलन रहती है, वे मेथी का सेवन सीमित रखें।
d. कड़वे रस की सही मात्रा क्यों ज़रूरी है?
इसके साथ ही आप गिलोय की बेल के पत्तों का काढ़ा बना सकते हैं. लेकिन यहाँ मात्रा का ध्यान रखना बहुत ज़रूरी है। इन काढ़ों की सही मात्रा लगभग 20 से 30 मिली ही होती है।
आजकल बहुत से लोग सुबह-सुबह एक पूरा गिलास करेले का जूस पी लेते हैं। आयुर्वेद के अनुसार यह तरीका सही नहीं है। इतनी ज़्यादा मात्रा में लिया गया कड़वा रस न केवल पचने में भारी होता है, बल्कि शरीर को इसकी ज़रूरत भी नहीं होती। ऊपर से, डायबिटीज़ के कारणों में आयुर्वेद ने द्रव आहार यानी ज़्यादा लिक्विड डाइट को भी जिम्मेदार माना है।
इस तरह अगर बहुत ज़्यादा मात्रा में कड़वे जूस लिए जाएँ, तो फायदा सीमित होता है और नुकसान की संभावना बढ़ जाती है।
e. ज्यादा कड़वा लेने से नुकसान भी हो सकता है
एक और अहम बात यह है कि अगर लंबे समय तक बहुत ज़्यादा कड़वा या कसैला रस लिया जाए, तो इससे वात दोष बढ़ सकता है और धातु क्षय भी हो सकता है। आचार्य वाग्भट्ट ने इस बारे में साफ चेतावनी दी है।
आयुर्वेद में शरीर की बनावट के आधार पर लोगों को मोटे तौर पर दो समूहों में बाँटा गया है।
पहला समूह वे लोग जिनका वजन ज़्यादा है, शरीर में चर्बी अधिक है या जिनमें कफ दोष की प्रधानता के कारण डायबिटीज़ हुई है। ऐसे लोगों को कड़वा रस लेने से आमतौर पर फायदा होता है।
लेकिन दूसरा समूह वे लोग हैं जिनका शरीर पहले से ही दुबला है, जिनमें वात दोष अधिक है। अगर ऐसे लोग बहुत ज़्यादा कड़वा या कसैला रस लेने लगते हैं, तो उनमें भूख न लगना, जोड़ों में दर्द, अत्यधिक थकान और कमजोरी जैसी समस्याएँ बढ़ सकती हैं। इसलिए हर रस का सेवन शरीर की प्रकृति देखकर करना चाहिए।
4. डायबिटीज़ की सरल लेकिन असरदार आयुर्वेदिक औषधि
आयुर्वेद में डायबिटीज़ के लिए एक बेहद आसान और असरदार योग बताया गया है, जिसे निशा आमलक योग या हरिद्रा आमलक योग कहा जाता है। यहाँ निशा या हरिद्रा का मतलब है हल्दी और आमलक का मतलब है आंवला।
अगर आपको ताज़ा आंवला मिल जाता है, तो एक आंवला कद्दूकस करके उसमें दो से तीन चुटकी हल्दी मिलाएँ और इसे सुबह खाली पेट लें।
अगर आंवले का रस निकालना चाहें, तो 15 से 20 मिली आंवले के रस में थोड़ी सी हल्दी मिलाकर सुबह सेवन किया जा सकता है।
अगर कच्ची हल्दी उपलब्ध हो, तो उसे भी हल्का सा कद्दूकस करके आंवले के साथ लिया जा सकता है।
और अगर आंवला या ताज़ी हल्दी न मिले, तो आंवला चूर्ण के साथ थोड़ी सी हल्दी मिलाकर सेवन किया जा सकता है।
यह योग इसलिए खास है क्योंकि आंवला एक श्रेष्ठ रसायन है और हल्दी हमारे रोज़ के भोजन में भी रहती है। जब ये दोनों साथ आते हैं, तो डायबिटीज़ में बहुत अच्छा असर दिखाते हैं।
5. क्या रसोई के मसाले भी दवा बन सकते हैं?
अब सवाल आता है कि क्या हमारे किचन में मौजूद मसाले और अचार डायबिटीज़ में मदद कर सकते हैं? जवाब है – हाँ, अगर सही तरीके से इस्तेमाल किए जाएँ।
आजकल जो रेडीमेड अचार बाज़ार से आते हैं, उनमें प्रिज़र्वेटिव, फूड कलर और घटिया तेल मिला होता है। यही वजह है कि बहुत से लोगों को अचार खाने से एसिडिटी, सिरदर्द या जलन होने लगती है।
लेकिन घर का बना अचार, जैसे आंवले का अचार, हल्दी का अचार या करेले का अचार, डायबिटीज़ में औषधि की तरह काम करता है। इनमें इस्तेमाल होने वाले मसाले जैसे हल्दी, जीरा, सरसों और थोड़ा सा तेल खुद औषधीय गुण रखते हैं।
बस ध्यान इतना रखना है कि अचार को सब्ज़ी की तरह नहीं खाना है। इसकी मात्रा हमेशा सीमित रखें।
6. विरुद्ध आहार: गलत फूड कॉम्बिनेशन से बचें
आयुर्वेद में कुछ ऐसे फूड कॉम्बिनेशन बताए गए हैं जो साथ में लेने पर शरीर को नुकसान पहुँचाते हैं। इन्हें विरुद्ध आहार कहा जाता है।
जैसे रात में दही खाना, दही को गर्म करना, या बहुत ज़्यादा मात्रा में अकेले दही खाना शरीर के लिए ठीक नहीं है।
इसी तरह शहद और गर्म पानी का कॉम्बिनेशन भी आयुर्वेद के अनुसार विरुद्ध आहार माना गया है। भले ही शहद और गर्म पानी अलग-अलग अच्छे हों, लेकिन साथ में लेने पर यह शरीर के लिए हानिकारक हो सकता है।
खट्टे फलों को दूध के साथ लेना, जैसे मिल्कशेक बनाकर पीना, अलग-अलग फलों को एक साथ मिलाकर खाना या उन पर कस्टर्ड डालकर खाना भी सही नहीं है।
7. ज़्यादा पानी और लिक्विड डाइट भी नुकसानदेह
आजकल “स्टे हाइड्रेटेड” के नाम पर लोग ज़रूरत से ज़्यादा पानी और जूस पीने लगे हैं। आयुर्वेद के अनुसार यह भी डायबिटीज़ का एक बड़ा कारण है।
जब बिना प्यास के बार-बार पानी पिया जाता है, तो यह कफ दोष को बढ़ाता है और आम (अपचित पदार्थ) उत्पन्न करता है। इससे शरीर में चिपचिपापन और गीलापन बढ़ता है, जो आगे चलकर डायबिटीज़, हाई ब्लड प्रेशर, किडनी और यूरिन से जुड़ी समस्याओं को जन्म देता है।
इसलिए पानी हमेशा प्यास के अनुसार और मौसम व शरीर की प्रकृति को ध्यान में रखकर ही पीना चाहिए।
8. बार-बार खाना सही है या गलत?
डायबिटीज़ में अक्सर सलाह दी जाती है कि थोड़ा-थोड़ा और बार-बार खाना चाहिए। लेकिन आयुर्वेद इसे “अध्यशन” कहता है।
अगर पिछला भोजन पूरी तरह पचा नहीं है और फिर भी आप दोबारा खाना खा लेते हैं, तो यह आम को बढ़ाता है और कफ दोष को बढ़ाता है। इससे शरीर में चिपचिपापन बढ़ता है और बीमारी गहराती है।
हर व्यक्ति की अग्नि अलग होती है। पित्त प्रकृति वालों की अग्नि तेज़ होती है, उन्हें जल्दी भूख लगती है। कफ प्रकृति वालों की अग्नि मंद होती है, उन्हें देर से भूख लगती है। वात प्रकृति वालों की भूख अनियमित होती है।
इसलिए खाना हमेशा अपनी पाचन शक्ति और भूख के अनुसार ही खाना चाहिए। एक ही नियम सभी पर लागू नहीं होता।
Conclusion: संतुलन ही सबसे बड़ा इलाज है
इस post में हमने डायबिटीज़ के मरीज़ों के लिए बेस्ट आयुर्वेदिक डाइट प्लान को आसान लेकिन प्रभावी टिप्स के रूप में समझा। यह डाइट प्लान कोई ज़बरदस्ती नहीं करता, बल्कि शरीर को संतुलन की ओर लौटने का मौका देता है। अगर आप इसे समझदारी से अपनाते हैं, तो न सिर्फ शुगर कंट्रोल में रहती है, बल्कि भविष्य की कई बीमारियों से भी बचाव होता है।
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