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पेट की गैस को जड़ से ख़त्म करने के लिए अपनाये ये घरेलू उपाय

पेट की गैस को जड़ से ख़त्म करने के लिए अपनाये ये घरेलू उपाय 

पेट की गैस को जड़ से ख़त्म करने के लिए अपनाये ये घरेलू उपाय


आज कल के खान-पान और बदलते परिवेश के कारण कई प्रकार के रोग पैदा हो जाते है। जिनमे एक रोग पेट में गैस का बनना भी है। जब यह रोग किसी व्यक्ति को हो जाता है तो उसके पेट में गैस बनने लगती है। जिसके कारण गैस बार-बार गुदा मार्ग से बाहर निकलती है या कई बार रुक जाती है। यह गैस बहुत बदबूदार होती है। 

इस रोग के कारण शरीर में वात रोग पैदा हो जाता है। पेट में गैस बनने के कारण कई प्रकार के रोग पैदा हो जाते है। जिसके कारण शरीर में बेचैनी, बदन में दर्द, पेट फूलना ( अफारा ), दिल घबराना, किसी कार्य को करने में मन न लगना, भूख का मर जाना, शारीरिक तथा मानसिक असंतुलन और स्नायुविक दुर्बलता, पेट में हरदम दर्द रहना, पेट का बोलना, नींद न आना आदि। 

पेट में गैस बनने के कारण 

यह रोग अधिकतर कब्ज, खाना न पचना ( अपच ), भोजन को ठीक से चबाकर न खाना, मल व मूत्र को अधिक देर तक रोककर रखना, दूषित भोजन करना, भोजन समय पर न करना, चिंता, भय, शोक, तनाव आदि के कारण यह रोग हो जाता है। 

पेट की गैस को ख़त्म करने के उपाय 

  • इस रोग से पीड़ित रोगी को कम से कम दो दिनों तक ताजा फलों का रस पीकर उपवास रखना चाहिए। ऐसा करने से रोगी का यह रोग कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है।
  • गर्म पानी में निम्बू का रस मिलाकर पीने से भी यह रोग ठीक हो जाता है। 
  • अदरक का रस तथा शहद मिलाकर दिन में 3 - 4 बार चाटने से रोगी को बहुत अधिक फायदा मिलता है। 
  • कुछ दिनों तक लगातार मठ्ठा पीने से भी यह रोग ठीक हो जाता है। 
  • रोगी व्यक्ति यदि कुछ दिनों तक फलों तथा सलाद का सेवन करे और इसके बाद कुछ  दिनों तक अंकुरित अन्न खांए तो पेट में गैस बनना रुक जाती है। 
  • इस रोग से पीड़ित रोगी को चोकर समेत आटे की रोटी खानी चाहिए। 
  • रोगी को कभी भी अधिक गर्म या अधिक ठंडी चीजें नहीं खानी चाहिए। 
  • प्रतिदिन छोटी हरड़ को मुँह में रखकर चूसने से भी यह रोग ठीक जाता है। 
  • इस रोग से पीड़ित रोगी को प्रतिदिन त्रिफला का चूर्ण पानी के साथ सेवन करना चाहिए तथा हरा धनिया खाना चाहिए। इससे यह रोग कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है। 
  • प्रतिदिन भिगोए हुए 10 दाने मुनक्का तथा 2 अंजीर खाने से भी पेट की गैस में आराम मिलता है। 
  • रोगी व्यक्ति को भोजन के बाद वज्रासन करना चाहिए ताकि यह रोग पूरी तरह से ठीक हो सके। 
  • रोगी व्यक्ति को चाय, चना, तली भुनी चीजें आदि नहीं खानी चाहिए। 
  • इस रोग से पीड़ित व्यक्ति को केवल 2 समय ही भोजन करने का नियम बनाना चाहिए। 
  • सप्ताह में एक बार उपवास जरूर रखना चाहिए ताकि पाचन तंत्र के कार्य पर भार न पड़े और खाया हुआ भोजन आसानी से पच सके तभी यह रोग ठीक हो सकता है। 
  • पेट में गैस बनने से रोकने के लिए रोगी को पेट पर गर्म-ठंडी सिंकाई करनी चाहिए तथा इसके बाद एनिमा क्रिया करके अपने पेट को साफ़ करना चाहिए। इसके बाद कटिस्नान करना चाहिए और पेट पर मिट्टी की गीली पट्टी कुछ समय के लिए लगानी चाहिए। 
  • पेट की गैस को बनने से रोकने के लिए कई प्रकार के यौगिक क्रिया तथा योगासन है जिसको करने से यह रोग ठीक हो जाता है। ये आसन और यौगिक क्रिया इस प्रकार है - पश्चिमोत्तानासन, धनुरासन, शलभासन, उत्तानपादासान, भुजंगासन, हलासन, मयूरासन, नौकासन तथा सुप्तपवन मुक्तासन आदि। 
  • प्रतिदिन सुबह के समय में पीठ के बल लेटकर साइकिल चलाने की तरह अपने पैरों को 15 मिनट तक चलाने तथा उड्डियान बंध व कपालभाति तथा प्राणायाम व व्यायाम करने से भी यह रोग ठीक हो जात्ता है। 

पेट के रोगों की आयुर्वैदिक दवाएं 

पेट की कोई भी बीमारी आज के समय में किसी को भी होना आम बात है , इसका प्रमुख कारण है अनियमित खान-पान और दिनचर्या।  यहां हम आयुर्वेदिक दवाओं की जानकारी के अंतर्गत पेट रोगों की दवाएं बता रहे है, ये आयुर्वेदिक दवाएं लेने से पहले हो सके तो कृपया अपने किसी वैद्य से सलाह जरूर लें। 

बदहजमी, पेट दर्द, भूख न लगना, अजीर्ण, वायुगोला, पेट फूलना आदि के लिए :- हिंग्वाष्टक चूर्ण, शंखवटी, रसोनवटी, सुलेमानी नमक चूर्ण, अष्टांग लवण चूर्ण, चित्रकादि वटी, कुमारी आसव, पिपल्यासव, अर्क सौंफ, अर्क अजवाइन। 

अम्लपित्त ( खट्टी डकारें आना, गले व छाती की जलन आदि ) :- अविपत्तिकर चूर्ण, धात्री लौह, प्रवाल पंचामृत, लीलाविलास रस, सूतशेखर रस, कामदुधा रस, चन्द्रकला रस, भृंगराजासव, स्वर्जिकाक्षार। 

शूल एवं परिणाम शूल ( तीव्र चुभन वाला दर्द जो की पीठ व गुप्तांगो की तरफ बढ़ता है, उल्टी होना, खाली पेट होने के समय दर्द अधिक हो, दस्त काला आता हो तो :- महाशंखवटी, शंख भस्म, शतावरी घृत, हिंग्वाष्टक चूर्ण, रसोनवटी, अभ्र्क भस्म। 

पीलिया, खून की कमी, जिगर बढ़ना, पेट दर्द, जी मिचलाना आदि के लिए :- लिवकेयर, सीरप, आरोग्यवर्दिधनि, लोहासव, पुनर्नवारिष्ठ, यकृतप्लीहारी लौह, कांतिसार, पिपल्यासव, चंद्रकलारस, स्वर्णसूतशेखर। 

पेट के कृमि रोगों पर - विडंगासव, विडंगारिष्ट, कृमिकुठार रस। 

वायु अधिक बनना व उससे उत्पन्न विकार :- हिंग्वाष्टक चूर्ण, रसोनवटी, कुमारी असाव। 

कब्जियत :- त्रिफला चूर्ण, स्वादिष्ट विरेचन चूर्ण, पंचसकार चूर्ण, माजून मुलयैन, इच्छाभेदी वटी, नारायण चूर्ण। 

दस्त अधिक लगना, पतले दस्त, आंव, मरोड़ :- कुटजारिष्ट, रसपर्पटी, जातिफलदी चूर्ण।                                  

                            

1 comment:

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